कुण्डलिनी शक्ति।

भारतीय गुरु शिष्य परंपरा का अति महत्वपूर्ण अंग है।

शास्त्रों में वर्णन है कि भगवान वशिष्ठ ने श्री राम और लक्ष्मण को भी कुण्डलिनी साधना करवाई थी।

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यह शक्ति सुषुप्त अवस्था में मानव के मूलाधार में स्थित रहती हैं। इनकी इष्ट देवी माता त्रिपुर सुंदरी हैं।

वैसे तो आयुर्वेद और योग शास्त्र में मानव शरीर में अनेक चक्रों का वर्णन है किन्तु सप्तचक्रों की प्रधानता है।

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कुण्डलिनी ऊर्जा रीढ़ की हड्डी की सीध में इन्हीं चक्रों से होती हुई मूलाधार से सहस्रार में जा कर परम सत्ता से मिलती है।

शास्त्रों में कुण्डलिनी जागरण के अनेक मार्ग बताए गए हैं। सिर्फ एक मार्ग का अनुसरण करके माता कुल कुण्डलिनी को प्रसन्न नहीं किया जा सकता।

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मुख्य बात ये की सभी मार्ग के लिए एक योग्य गुरु की आवश्यकता है। बिना गुरुकृपा के ये संभव नहीं।

आइए कुछ मार्गों को देखते हैं।

१. अष्टांग योग: पतंजलि योग सूत्र में ऋषि ने विस्तार से इस मार्ग का उल्लेख किया है।
इसके आठ अंग हैं।

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महत्वपूर्ण बात ये है कि ये आठ सीढ़ियां नहीं है। सभी जब एक साथ प्रयोग किए जाएं और एक एक अंग को पूरी जिम्मेदारी से अपनाया जाए।

यम नियम आसन तथा प्राणायाम आपके शरीर को साधते हैं।

प्रत्याहार, धारणा, ध्यान तथा समाधि आपके पंच कोशीय शरीर को शुद्ध करती है।

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सभी आठ अंग जब सिद्ध हो जाते हैं तो कुण्डलिनी स्वतः जागृत हो जाती है।

२. हठयोग: महासिद्घ मत्स्येंद्रनाथ को हठयोग का ज्ञान स्वयं महादेव से प्राप्त हुआ है

हठयोग प्रदीपिका में यौगिक क्रियाओं जैसे आसन, प्राणायाम षड्कर्म आदि का वर्णन है।

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इन क्रियाओं के प्रयोग से शरीर के सभी विकार दूर हो जाते हैं तथा सभी सप्त चक्र जागृत हो जाते हैं।

३. ध्यान योग: जब मनुष्य एकाग्रचित हो कर किसी एक बिंदु पर ध्यान केंद्रित कर लेता है तब ध्यान योग की सिद्धि होती है।

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साधक विभिन्न प्रकार के लाभ हेतु विभिन्न वस्तुओं का प्रयोग करते हैं।

विद्वानों का कथन है कि कुण्डलिनी जागरण का ये सबसे सुगम मार्ग है।

४. नाद योग: ध्वनि जो अनवरत चलती रहे उसको नाद कहते हैं।

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जब साधक अपने श्रवण इन्द्रिय का अवरोध कर के अन्तःकरण की ध्वनि सुनने का प्रयत्न करता है तब उसे नाद सुनाई देता है। नित्य अभ्यास से वह हृदय से निकली अनाहत नाद को जब सुनने लगता है तो कुण्डलिनी सिद्ध हो जाती है।

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५. तंत्र मार्ग: कुण्डलिनी जागरण का ये मार्ग सबसे ख़तरनाक किन्तु शीघ्र फल देने वाला बताया गया है।

मंत्र जाप, विभिन्न तांत्रिक अनुष्ठान आदि के द्वारा अपनी ऊर्जा को उच्च स्तर पर ले जा कर शीघ्र ही चक्रों का भेदन किया जाता है।

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बिना गुरु के ये क्रिया निषिद्ध है।

रामायण में रामानंद सागर जी ने महर्षि वाल्मीकि तथा ब्रह्मर्षि वशिष्ठ के माध्यम से इसके बारे में बताने की चेष्टा की है।

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आज यदि शिक्षा व्यवस्था को गुरुकुल की ओर ले जा कर सभी विद्यार्थियों को इस विद्या का अभ्यास कराया जाए तो समाज की सभी समस्याएं हल हो सकती है।